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    Circus by Jai Ojha – Mujhe Nahi Samajh Aata Kyun


    Mujhe Nahin Samjh Aata Kyun?

    मुझे नहीं समझ आता क्यों, मुझे नहीं समझ आता क्यों,
    क्यों वो शख्श जिसमे मुझे अपना सबकुछ नजर आया,
    वो दुबारा नजर तक नहीं आया..
    कि वो राही जिसे मिल गया है हमसफ़र कोई और,
    लौटकर घर नहीं आया..
    क्यों मान लिए किसी ने अपना और फेंक दिया अगले ही पल,
    जैसे कभी कोई राब्ता ना था..
    कि वो जो सिर्फ और सिर्फ मेरा लगने लगा था,
    मेरा ना था..
    कि वो जिसने तुम्हे दिखा दिए तमाम हसीं ख्वाब,
    सबको कुचलकर आगे बढ़ जाता है..
    और क्यों तुम्हारा जेहन यकीन करता है इतना,
    कि बस उम्मीद लिए रह जाता है..
    क्यों किसी गैर के दिए जख्म का कभी फ़र्क़ नहीं पड़ता,
    और क्यों किसी अपने के ठुकराने पर दिल फिर सम्भल नहीं पाता..

    मुझे नहीं समझ आता क्यों, मुझे नहीं समझ आता क्यों,
    एक परिंदा आसमान में उड़ते हुए रह जाता है इतने पीछे,
    कि दोबारा उसे अपना काफिला नहीं दिखता..
    और आखिर क्यों दर बदर भटकने पर भी उसे,
    तिनका तिनका जोड़कर बनाया अपना घोंसला नहीं मिलता..
    मुझे समझ नहीं आता क्यों,
    उस महंगी कार को जो तेजी से गुजर जाती है,
    सड़क के किनारे सोया बच्चा नहीं दिखता..
    और आखिर क्यों फ़क़त एक लाइन खींच देने पर,
    एक शख्स को दूसरे शख्श में इंसां नहीं दिखता..
    मुझे नहीं समझ आता क्यों एक सजी परोसी थाली को,
    उसके खाने वाला नहीं मिलता..
    और आखिर क्यों एक मासूम को कचरे के ढेर में ढूंढ़ने पर भी,
    अपना निवाला नहीं मिलता..

    मुझे नहीं समझ आता क्यों, मुझे नहीं समझ आता क्यों,
    एक तरफ विश्व की सबसे ऊँची ईमारत खड़ी होती है,
    और दूसरी तरफ एक शख्श अपना घर तूफ़ान में उड़ जाने के डर से सो नहीं पाता..
    और आखिर क्यों उसे बचपन से लेकर आज तक,
    बार बार कहकर पुकारा गया है मर्द..
    कि वो सिसकियाँ भरता है लेकिन कभी खुलकर रो नहीं पाता..
    मुझे नहीं समझ आता क्यों एक बच्चे का बस्ता इतना भारी कर दिया जाता है,
    कि वो नहीं पाता ताउम्र जो वो बन सकता था..
    और आखिर क्यों उसे खुला मैदान छोड़कर थमाया जाता है एक टारगेट,
    जो ताजिंदगी कभी पूरा नहीं हो पाता..

    मुझे नहीं समझ आता क्यों, मुझे नहीं समझ आता क्यों,
    मजबूरियों ने किसी के बचपन को इतनी बेरहमी से जकड़ा होता है,
    आखिर क्यों दुकान पर उन नन्ही सी मासूम उँगलियों ने,
    चाय के गलास को पकड़ा होता है..
    मुझे नहीं समझ आता क्यों यहाँ जीने के लिए हर रोज मरना पड़ता है..
    क्यों एक मुर्दा इमारत के बनने के लिए जिन्दा पेड़ को काटना पड़ता है..
    ये कैसा सर्कस है जिंदगी का साहब,
    कि यहाँ रोटी के लिए एक बच्ची को सर्कस में होना पड़ता है..
    मुझे नहीं समझ आता क्यों.......



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