Bin Bulaye The Woh – Periods by Neha Duseja

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Bin Bulaye The Woh  – Periods by Neha Duseja

वो दर्द में करराहती रही,
ना जाने अपने लबों के पीछे कितना कुछ छुपाती रही।
मासिक धर्म के नाम पर,
ना जाने कितने धार्मिक स्थलों से निकाली जाती रही।
वो दर्द में इतना करराहती रही..

उसके संघर्ष पर किये कई विमर्श,
पर उन दिनों किया ना उसे किसी ने स्पर्श।
वो खून से धब्बो सी सलवार,
ने किये उसकी शुद्धता पे कई वार।
वो दर्द में करराहती रही,
अपने लबों के पीछे कितना कुछ छुपाती रही।

जैसे मानो कल ही तो वो बच्ची थी।
और आज वो महिला कहला रही थी।
वो दर्द में काफी कुछ छुपाती रही।

अनजान थी वो कई बदलाव से,
जिनका जवाब मांग रही थी सबसे,
कमर दर्द, सर दर्द और ना जाने कितने दर्द में,
ढाल रही थी खुद को अब।
बार-बार समझाया जाता था उसे,
ये आम है।
पर फिर क्यों मर्द इस दर्द से अनजान है।

क्या महिला होना गुनाह है।
क्या यही मेरी सजा है।
अभिशाप नहीं, स्वाभाविक हूँ मैं,
ये छुपाने वाला कोई राज़ नहीं।
मन को मैला ना कर, लबों को साफ़ मत बता,
पीरियड्स” ही तो हूँ जनाब,
इतना क्या इसे रोग बताता है।

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