Ek Roz Kitaab Se Phool Mila by Jai Ojha

Ek Roz Kitaab Se Phool Mila, Bilkul Mujh Jaisi Hi Halat Me..
Tanha Sa Par Hansta Hua, Fana Ho Gya Mohabbat Me..

अमूमन ऐसा होता है कि जब हम कोई पुरानी किताब उठाते है और उसे खोलते है तो अक्सर हमें उसमे एक दबी हुई मोहब्बत मिलती है, वो दबी हुई मोहब्बत जिसे गुले सुर्ख कहा गया है, गुलाब का फूल जोकि प्रेम की निशानी है मोहब्बत का प्रतीक है, उसकी अपनी एक दास्तां है, अपनी एक कहानी है, उस कहानी को आज मैं बयां करने जा रहा हूँ. आप सबके सामने इस कहानी को पेश कर रहा हूँ, आप सब की तवज्जो चाहूंगा..

एक रोज़ किताब से फूल मिला, बिलकुल मुझ जैसी ही हालत में..
तन्हा सा पर हँसता हुआ, फ़ना हो गया मोहब्बत में..

लोग कहते है मुरझाया है, जख़्म बड़े ही गहरे है..
लेकिन ध्यान से देखो तो सूफ़ी हुआ है, इश्क़ की खुशबू बिखेरे है..
अरे जख्मों से जिसके खुशबू आये, सोचो वो मरा होगा कैसी राहत में..
एक रोज़ किताब से फूल मिला, बिलकुल मुझ जैसी ही हालत में..

ना जाने कितनी पीड़ाएँ सही, दर्द का भी कोई पार नहीं..
ये इश्क़ शायद एकतरफा था, था जिसमें कोई व्यापार नहीं..
अरे क्या कमाल बंदगी है उसकी, माशूक है जिसकी इबादत में..
एक रोज़ किताब से फूल मिला, बिलकुल मुझ जैसी ही हालत में..

दर्द जब हद से गुजरा एक रोज़, तो दर्द में ही दवा मिली..
घुटन हुई दो पन्नो के बीच, तो शायरी की हवा मिली..
कांटे हो बदन पर भले ही, लेकिन उम्र गुजरी है शहादत में..
एक रोज़ किताब से फूल मिला, बिलकुल मुझ जैसी ही हालत में..

जिन हाथों ने कुचला इसको, वो हाथ भी खुशबू से महक उठे..
क्या है कोई इस दुनिया में कहीं, जो यूँ मुरझाकर भी चमक उठे..
सदियों से ये पाक मोहब्बत, दफ़न होती है इसी रिवायत में..
एक रोज़ किताब से फूल मिला, बिलकुल मुझ जैसी ही हालत में..

लेकिन इस फूल को कोई मलाल नहीं है, जीवन इश्क़ पर लुटाया है..
क्या हस्ती है उस आशिक की, जिसने काँटों को इश्क़ सिखाया है..
अरे गम भला क्या होगा उसको, कुर्बां हुआ है जो चाहत में..
एक रोज़ किताब से फूल मिला, बिलकुल मुझ जैसी ही हालत में..

एक रोज़ किताब से फूल मिला, बिलकुल मुझ जैसी ही हालत में..
तन्हा सा पर हँसता हुआ, फ़ना हो गया मोहब्बत में..

Circus by Jai Ojha – Mujhe Nahi Samajh Aata Kyun

Mujhe Nahin Samjh Aata Kyun?

मुझे नहीं समझ आता क्यों, मुझे नहीं समझ आता क्यों,
क्यों वो शख्श जिसमे मुझे अपना सबकुछ नजर आया,
वो दुबारा नजर तक नहीं आया..
कि वो राही जिसे मिल गया है हमसफ़र कोई और,
लौटकर घर नहीं आया..
क्यों मान लिए किसी ने अपना और फेंक दिया अगले ही पल,
जैसे कभी कोई राब्ता ना था..
कि वो जो सिर्फ और सिर्फ मेरा लगने लगा था,
मेरा ना था..
कि वो जिसने तुम्हे दिखा दिए तमाम हसीं ख्वाब,
सबको कुचलकर आगे बढ़ जाता है..
और क्यों तुम्हारा जेहन यकीन करता है इतना,
कि बस उम्मीद लिए रह जाता है..
क्यों किसी गैर के दिए जख्म का कभी फ़र्क़ नहीं पड़ता,
और क्यों किसी अपने के ठुकराने पर दिल फिर सम्भल नहीं पाता..

मुझे नहीं समझ आता क्यों, मुझे नहीं समझ आता क्यों,
एक परिंदा आसमान में उड़ते हुए रह जाता है इतने पीछे,
कि दोबारा उसे अपना काफिला नहीं दिखता..
और आखिर क्यों दर बदर भटकने पर भी उसे,
तिनका तिनका जोड़कर बनाया अपना घोंसला नहीं मिलता..
मुझे समझ नहीं आता क्यों,
उस महंगी कार को जो तेजी से गुजर जाती है,
सड़क के किनारे सोया बच्चा नहीं दिखता..
और आखिर क्यों फ़क़त एक लाइन खींच देने पर,
एक शख्स को दूसरे शख्श में इंसां नहीं दिखता..
मुझे नहीं समझ आता क्यों एक सजी परोसी थाली को,
उसके खाने वाला नहीं मिलता..
और आखिर क्यों एक मासूम को कचरे के ढेर में ढूंढ़ने पर भी,
अपना निवाला नहीं मिलता..

मुझे नहीं समझ आता क्यों, मुझे नहीं समझ आता क्यों,
एक तरफ विश्व की सबसे ऊँची ईमारत खड़ी होती है,
और दूसरी तरफ एक शख्श अपना घर तूफ़ान में उड़ जाने के डर से सो नहीं पाता..
और आखिर क्यों उसे बचपन से लेकर आज तक,
बार बार कहकर पुकारा गया है मर्द..
कि वो सिसकियाँ भरता है लेकिन कभी खुलकर रो नहीं पाता..
मुझे नहीं समझ आता क्यों एक बच्चे का बस्ता इतना भारी कर दिया जाता है,
कि वो नहीं पाता ताउम्र जो वो बन सकता था..
और आखिर क्यों उसे खुला मैदान छोड़कर थमाया जाता है एक टारगेट,
जो ताजिंदगी कभी पूरा नहीं हो पाता..

मुझे नहीं समझ आता क्यों, मुझे नहीं समझ आता क्यों,
मजबूरियों ने किसी के बचपन को इतनी बेरहमी से जकड़ा होता है,
आखिर क्यों दुकान पर उन नन्ही सी मासूम उँगलियों ने,
चाय के गलास को पकड़ा होता है..
मुझे नहीं समझ आता क्यों यहाँ जीने के लिए हर रोज मरना पड़ता है..
क्यों एक मुर्दा इमारत के बनने के लिए जिन्दा पेड़ को काटना पड़ता है..
ये कैसा सर्कस है जिंदगी का साहब,
कि यहाँ रोटी के लिए एक बच्ची को सर्कस में होना पड़ताहै..
मुझे नहीं समझ आता क्यों…….

Intezaar Poetry by Jai Ojha – love Poem

Chalo Accha Hai Is Intezaar Mein Ye Zindagi To Gujar Jayegi…
Bas Mere Intezaar Ki Intha Kya Hai Ye Mat Pooch Mujhse,
Itna Samajh Le Ki Marte Waqt Bhi Aankhe Khuli Reh Jayegi..

चलो अच्छा है इस इंतज़ार में ये जिंदगी तो गुजर जाएगी..
कवितायेँ जब तुमको छूकर लौट आएगी,
कवितायेँ जब तुमको छूकर लौट आएगी,
हाँ तब, तब किसी रोज सुकूँ से मौत आएगी..
हाँ तब, तब किसी रोज सुकूँ से मौत आएगी..

हम ब्लॉक है पर करेगें तेरी फोटो पे क्लिक बार बार,
हम ब्लॉक है पर करेगें तेरी फोटो पे क्लिक बार बार,
कभी तुम भी करके देखो ना, जरा तकलीफ समझ आएगी..
कभी तुम भी करके देखो ना, जरा तकलीफ समझ आएगी..

हम आये है तेरे शहर में, ना जाने कब मुलाक़ात तुमसे हो पायेगी,
हम आये है तेरे शहर में, ना जाने कब मुलाक़ात तुमसे हो पायेगी,
कभी तो कहीं तो नजर आओगी तुम मुझे,
कभी तो कहीं तो नजर आओगी तुम मुझे,
चलो अच्छा है इस इंतज़ार में ये जिंदगी तो गुजर जाएगी..
चलो अच्छा है इस इंतज़ार में ये जिंदगी तो गुजर जाएगी..

हमारी दास्ताँइश्क़ में तुम भी तो शामिल रही अब तक,
हमारी दास्ताँइश्क़ में तुम भी तो शामिल रही अब तक,
आज नहीं तो कल याद तुम्हे भी बहुत आएगी..
आज नहीं तो कल याद तुम्हे भी बहुत आएगी..

तेरी मेरी साँसों ने देखी जो इंतहा हमारे इश्क़ की,
तेरी मेरी साँसों ने देखी जो इंतहा हमारे इश्क़ की,
बता ना ये सांसे कैसे झूठ बोल पाएगी..
बता ना ये सांसे कैसे झूठ बोल पाएगी..

बस इतना मलाल रहा कि तुमसे ज्यादा वफादार तुम्हारी याद निकली,
बस इतना मलाल रहा कि तुमसे ज्यादा वफादार तुम्हारी याद निकली,
ये ताउम्र मुझे छोड़कर नहीं जाएगी..
ये ताउम्र मुझे छोड़कर नहीं जाएगी..

एक तेरी फितरत जो भूल जाती है कसमें सारी,
एक तेरी फितरत जो भूल जाती है कसमें सारी,
और एक मेरी रूह जो मरके भी वादे सारे निभाएगी..
और एक मेरी रूह जो मरके भी वादे सारे निभाएगी..

ये रंज है कि मेरा दर्द दिल अब कभी मिटेगा नहीं दोस्त,
हाँ ये रंज है कि मेरा दर्द दिल अब कभी मिटेगा नहीं दोस्त,
और ये गनीमत भी कि अब कोई चोट मेरा दिल नहीं तोड़ पाएगी..
और ये गनीमत भी कि अब कोई चोट मेरा दिल नहीं तोड़ पाएगी..

बस मेरे इंतज़ार की इंतहा क्या है ये मत पूछ मुझसे,
बस मेरे इंतज़ार की इंतहा क्या है ये मत पूछ मुझसे,
इतना समझ ले कि मरते वक़्त भी आंखे खुली रह जाएगी..
इतना समझ ले कि मरते वक़्त भी आंखे खुली रह जाएगी..

तुम्हारा इंतज़ार बढ़ते बढ़ते एक रोज इस हद तक जा पहुंचा,
कि तुमसे इसका ताल्लुक ही ना रहा..

 
 

Tere Jaane Ke Baad by Jai Ojha – The Digital Shayar

Main Rota Tha To Thik Tha, Ab Khamosh Rehne Laga Hoon…
Dekh Tere Jaane Ke Baad Main Dhire Dhire Marne Laga Hoon..

एक बार में मर जाना आसान है, लेकिन तिल तिल कर मरना, धीरेधीरे मरना बेहद मुश्किल..मगर जब वो साथ छोड़ दे तो आप धीरे धीरे मरने लगते हैं और मोहब्बत धीरेधीरे मरना सीखा देती है

मैं रोता था तो ठीक था, अब खामोश रहने लगा हूं
देख तेरे जाने के बाद मैं धीरेधीरे मरने लगा हूं..

तेरे जाने के बाद मेरे वजूद को जैसे एक अजीब सन्नाटे ने है घेर लिया..
क्या बताऊं क्या हश्र हुआ जब से तूने है मुंह फेर लिया..
अब आठों ही पहर मैं बेहोश हूं बिस्तर से उठ नहीं पाता हूं..
मैं बात करूं तो किससे करूं किसी को समझ नहीं आता हूं..
मैं तन्हा था तो ठीक था, मैं तन्हा था तो ठीक था..
अब अंधेरे से बातें करने लगा हूं..
देख तेरे जाने के बाद मैं धीरेधीरे मरने लगा हूं..

तेरे जाने के बाद अजीब मसला है कि मैं सो पाता हूं जग पाता हूं..
तेरे जाने के बाद मैं सो पाता हूं जग पाता हूं..
जल चुका हूं, राख हूं फिर भी हर रोज सुलग जाता हूं..
अब स्याह रात में नींद मेरी एक झटके से खुलती है..
तेरे बिना एक रात तो जैसे एक सदी की तरह गुजरती है..
यू आदमी मैं भी काम का था, यू आदमी मैं भी काम का था.. 
अब देख कितना बेकार रहने लगा हूं..
देख तेरे जाने के बाद मैं धीरेधीरे मरने लगा हूं..

तेरे जाने के बाद मैं डरता हूं घुटनों को पकड़ कर सोता हूं..
खौफजदा हूं बेवफाई से हर शख्स से सहमा रहता हूं..
अब बेवजह ही मेरे कानों में फोन की घंटी बजती है..
आंखें फिर से उम्मीद लिए तेरी एक झलक को तरसती हैं..
तेरा इंतजार था तो ठीक था, तेरा इंतजार था तो ठीक था
अब तेरे आने की झूठी उम्मीदें रखने लगा हूं..
देख तेरे जाने के बाद मैं धीरेधीरे मरने लगा हूं..

तेरे जाने के बाद लगता है जैसे मेरे दिल को किसी ने जंजीरों से जकड़ लिया..
मेरी सांसे इतनी भारी क्यों है क्या हर सांस को किसी ने पकड़ लिया?
अब मैं तुझे कहां ढूंढूअपना फोन टटोलू
बाहर देखूं, तू है अब तो कहीं नहीं..
मैं क्या करूं मैं बेबस हूं, तेरी याद मेरे दिल से गई नहीं..
अब शायद इस चोट की कोई दवा नहीं, अब शायद इस चोट की कोई दवा नहीं,
बस लिखकर जख्म भरने लगा हूं..
देख तेरे जाने के बाद मैं धीरेधीरे मरने लगा हूं

उसे मोहब्बत के सिवा कुछ आता नहीं मजनू की खाता बस इतनी है..
वो लाइलाह कहे या लैला कहे उसे बात इश्क़ की करनी है..
काश कि कोई सौदा कर ले, सब ले ले और बदले में तुझे दे.. 
काश कि कोई आंखें पढ़ ले, शब्दों को जरा परे रख दे..
तुझसे नफरत थी तो ठीक था, तुझसे नफरत थी तो ठीक था..
अब तेरी इबादत करने लगा हूं,
देख तेरे जाने के बाद मैं धीरेधीरे मरने लगा हूं…

खैर मेरी अब कोई ख्वाहिश नहीं, इच्छाएं सारी मर गई..
अब तो जैसे वैरागी हूं, इनायत मुझ पर बरस गई..
नाम तेरा मैं जप रहा हूं, मानो हो सुमिरन भीतर चल रहा..
जैसे कोई सूफी हुआ हो, खुदा से दर पे मिल रहा
मैं तुझसे जुदा तो हो चुका हूं, मैं तुझसे जुदा तो हो चुका हूं..
और अब तेरे ही साथ रहने लगा हूं..
देख तेरे जाने के बाद मैं धीरे धीरे मरने लगा हूं..

मैं रोता था तो ठीक था, अब खामोश रहने लगा हूं 
देख तेरे जाने के बाद मैं धीरेधीरे मरने लगा हूं
देख तेरे जाने के बाद….

 
 

Ye Shaam Bilkul Tum Jaisi Hai by Jai Ojha

Din se milkar aati hai, Raat ke Aagosh me ghul Jati hai..
Ye Shaam Bilkul Tum Jaisi hai, Baat Baat me badal Jati hai..

बहुत से Writers हुए है इस दुनिया में, बहुत से शायर, बहुत से प्रेमी या बहुत से Artist, जिन्होंने अपनी अपनी गर्लफ्रेंड की तुलना, अपनी माशूका की तुलना अलग अलग चीजों से की है. जैसे किसी ने रात से तुलना की है, किसी ने चाँद से तुलना की है, किसी ने शबनम से तुलना की है, किसी ने फूल से तुलना की है, तो ऐसे Comparisons किये गए है और बहुत कुछ लिखा गया है. यहां पे जो Writer है इसकी जो गर्लफ्रेंड है वो इसकी जिंदगी में आती है और बार बार चली जाती है. बार बार आती है और बार बार चली जाती है तो इस वजह से इसके जीवन में एक बिखराव पैदा हो गया है. उस बिखराव के through ये Poetry निकलती है, तो वो लिखता है

कि दिन से मिलकर आती है, रात के आगोश में घुल जाती है..
दिन से मिलकर आती है, रात के आगोश में घुल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..

खूबसूरत है, शीतल है, आतुर भी है तुम जैसी,
खूबसूरत है, शीतल है, आतुर भी है तुम जैसी..
बस जरा नादान है शायद कि अधूरे चाँद से बहल जाती है..
ठंडी हवाएं, सुर्ख सफ़क और भी जाने कितने वादे है..
साथ रहने की कसमें खाकर, रफ़ता रफ़ता ढल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..

कि कभी सुर्ख लाल, कभी जर्द सी, कभी हवाओं सी मचल जाती है..
कभी सुर्ख लाल, कभी जर्द सी, कभी हवाओं सी मचल जाती है..
इसकी शक्ल होती अगर, तो हूहू दिखती तुम जैसी,
एक पल में मगरूर है और एक ही पल में पिघल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..

कि मन भरता है तो सब दबाकर, गम हो जाती है अँधेरे में..
मन भरता है तो सब दबाकर, गम हो जाती है अँधेरे में..
लौट आती है कुछ दूर जाकर, जब दोबारा मेरी कमी से खल जाती है..
कितना लम्बा इंतज़ार होता है कि कुछ पल मिल जाये ये शाम मुझे?
मैं आगोश में भरने लगता हूँ और ये बेरहम तन्हा छोड़ फिसल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..
बस एक गिला, एक मलाल ताउम्र रहेगा शायद इसे..
कि बस एक गिला, एक मलाल ताउम्र रहेगा शायद इसे..
कि आती है रोज मिलने और बिना मिले निकल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..

इस शाम के बाद ये रात मुझे काटनी मुश्किल हो जाती है..
कि शाम के बाद ये रात मुझे काटनी मुश्किल हो जाती है..
डूबते सूरज में सारी खुशियां जैसे, धीमी आंच पे जल जाती है..
कह दो इसे कि या तो रुक जाये, या तो ना आया करे यूँ कुछ वक़्त के लिए,
मैं बिखरा बिखरा रह जाता हूँ और ये अगले ही दिन संभल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..

 


Backspace main Chupi Reh Gayi by Jai Ojha

ऐसा बहुत बार होता है दुनिया में कि हम अपनों को बहुत कुछ लिखना चाहते है, लेकिन लिख नहीं पाते. Express करना चाहते है लेकिन Express कर नहीं पाते..क्यूंकि हमें उन्हें खोने का डर रहता है..

एक लड़का है जो अपनी दोस्त से प्यार कर बैठा है, वो दोस्त को Propose कर चाहता है लेकिन वो कर नहीं पा रहा..क्यूंकि उसे अपनी दोस्ती खोने का डर है..वो I love You लिखता है और Backspace दबा देता है..वो लड़का कोशिश करेगा कहने कि मगर कह नहीं पायेगा, उसी के ऊपर ये Poetry है..

Kuch Kahaniyan Hamare Darmiyaan,
Backspace main Chupi Reh gyi..

एक दोस्ती मोहब्बत में तब्दील होनी रह गई,
एक दोस्ती मोहब्बत में तब्दील होनी रह गई,
कुछ कहानियां, हमारे दरमियाँ,
Backspaceमें छुपी रह गई..

अंजाम तो तुम बेशक थी मेरा, तुम ही मेरी इत्तिदा भी थी..
दोस्त तो तुम थी मगर, दोस्त से कुछ ज्यादा भी थी..
अरे, अबके सावन लिखी थी तुमको कई चिट्ठियां,
शायद बारिशों में थी बह गई..
कुछ कहानियां, हमारे दरमियाँ, Backspace में छुपी रह गई..
अबके सावन लिखी थी तुमको कई चिट्ठियां,
शायद बारिशों में थी बह गई..
और जुबान तो मुकरती आई है, मुकर ही जाती,
ये ख़ामोशी संजीदा थी, तुम्हे समझ में आनी रह गई..
कुछ कहानियां, हमारे दरमियाँ,
Backspaceमें छुपी रह गई..

हम लबो से कह ना पाए हाल दिल कभी,
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या थी?
वो बात ऐसी थी, कि दिल से शुरू होती,
और जुबान पर आकर रुक जाती..
एक दोस्ती हर मर्तबा, मोहब्बत की दहलीज से,
वापस लौटकर जाती..
और जब फलाने का, ज़माने का सबका हाल लिखा तुमको,
फिर हाल दिल लिखने में उँगलियाँ क्यों थमी रह गई..
कुछ कहानियां, हमारे दरमियाँ, Backspace में छुपी रह गई..
और ताउम्र अफ़सोस रहा, कि आंखे तुम मेरी कभी पढ़ ना सकी,
और एक दास्तान रफ्ता रफ्ता अश्कों में थी बह गई..
कुछ कहानियां, हमारे दरमियाँ,
Backspaceमें छुपी रह गई..

मैं कोशिशें तुम्हें लिखने की सेहरो शाम करता ही रहा,
लेकिन एक ख्याल तुम्हें खोने का हर मर्तबा उठता ही रहा..
एक झूठ था जो बाजार में बड़ी आसानी से बिक गया,
और सच्चाई बेखौफ बेमलाल किसी कोने में दबी रह गई..
और दोस्ती अगर होती तो अब तक बैचैन बेकाबू सी हो जाती,
ये मोहब्बत ही रही होगी जो ख़ामोशी से थी बह गई..
कुछ कहानियां, हमारे दरमियाँ,
Backspaceमें छुपी रह गई..

कि बिन इश्क़ का इजहार किये, कैसे हो आशिक़ का गुजरा..
When a guy loves a girl,
The whole world knows about it,
Except the girl!
बिन इश्क़ का इजहार किये, कैसे हो आशिक़ का गुजरा..
बस तुम्हारे सिवा जिससे भी मिले, हर शख्स से किया जिक्र तुम्हारा..
हम लौट रहे थे महखाने से कि आज हाल दिल सुना देंगे,
बस एक नजर तुम्हें देखा और फ़ौरन सारी उतर गई..
कुछ कहानियां, हमारे दरमियाँ, Backspace में छुपी रह गई..

हम लौट रहे थे महखाने से कि आज हाल दिल सुना देंगे,
बस एक नजर तुम्हें देखा और फ़ौरन सारी उतर गई..
और जूनून होता तो शायद तुमको पा लेता बड़ी आसानी से,
ये इश्क़ था साहिब, इसलिए बातें अनकही थी रह गई
कुछ कहानियां, हमारे दरमियाँ,
Backspaceमें छुपी रह गई..

Woh Gairo ke Hona Seekh Gye by Jai Ojha

Hum unke the unhi ke rahe, 
Wo Na Jaane Kab gairo ke hona sikh gaye.

समय के साथ वक़्त के साथ किस तरह लोग बदल जाते है, उस पर यह शायरी है..
कि वो प्यार मोहब्बत के अकीदतमंद बड़ी जल्दी नफरत करना सीख गए..
कि वो प्यार मोहब्बत के अकीदतमंद बड़ी जल्दी नफरत करना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

हम तो नावाकिफ थे इस बात से कि वो अजनबी इस कदर हो जायेंगे..
नजर आते थे जो फ़ोन के हर गलियारें में, वो एक फोल्डर में सिमट कर रह जायेंगे..
हम तो नावाकिफ थे इस बात से कि वो इस रिश्ते को इतनी बेरहमी से तोड़ जायेंगे..
कि हमें सबसे पहले जवाब देने वाले हमारा Massage seen करके छोड़ जायेंगे..
हम शहरों शाम मुन्तजिर रहे उनके Massages जवाबों के,
और वो किसी दूसरी महफ़िल chat में Reply करना सीख गए..
जब बड़े दिनों बाद हम से पूछा हाल दिल उन्होंने,
तो भैय्या हम भी खुद्दार थे मुस्कुराके झूट बोलना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

हम नावाकिफ थे इस बात से कि लोग बदल भी जाया करते है..
वो आँखों में आँख डाल किये वादों से मुकर भी जाया करते है..
अरे सदायें (आवाज) आती थी जिनको हमारे सीने से,
वो अब किसी और से लिपटना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..
कि सदायें आती थी जिनको हमारे सीने से,
वो अब किसी और से लिपटना सीख गए..
और दिल में आशियाँ बनाया था जिन्होंने गुजरते हुए,
अब सामने से नजरे चुराके चलना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

हम नावाकिफ थे इस बात से कि वो चेहरे को साफ़ और दिल को मैला रखते है..
कुछ लोग हसी ऐसे भी होते है जो खिलौनों से नहीं जज्बातों से खेला करते है..
अरे, हम आशिक़ नादान थे ताजिंदगी भीतर बाहर एक से रहे,
और वो कम्बख्त बेवफाई करते करते रोजाना जिल्द बदलना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..
हमने उनके साथ अर्श (आकाश) के सपने देखे थे,
और जब हकीकत से हुए रूबरू तो खाई से उछलना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

हम नावाकिफ थे इस बात से कभी वक़्त हमारे इतना खिलाफ हो जायेगा..
कि उनकी मेहँदी में चुपके से बनाया वो अक्षर इस कदर साफ़ हो जायेगा..
हम उनके नाम का हर्फ़ हथेली पे नहीं दिल पे लिखना चाहते थे,
इसलिए दर्द होता रहा, हर्फ़ बनता रहा और हम दिल कुरेदना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..
दर्द होता रहा, हर्फ़ बनता रहा और हम दिल कुरेदना सीख गए..
हम उनपे मरकर जीना चाहते थे मगर,
हुए अलहदा (दूर होना) उनसे जबसे जीते जी मरना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

हम नावाकिफ थे इस बात से कि वो हमारे बिना भी रह सकते थे..
जो फ़साने उन्होंने हमसे कहे थे, अब वो किसी और से भी कह सकते थे..
अरे हमने तो सोना समझ यूँ पकडे रखा था उनको,
और वो कम्बख्त धूल थे निकले कि बड़े इत्मीनान से फिसलना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..
अरे हमने तो सोना समझ यूँ पकडे रखा था उनको,
और वो कम्बख्त धूल थे निकले कि बड़े इत्मीनान से फिसलना सीख गए..
हम कुछ देर जो दूर हुए क्या उनसे, वो हमारे बिना रहना ही सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

 
“इसरते कतरा है दरियां में फ़ना हो जाना”
“दर्दका हद से गुजरना है दवा हो जाना”

 
 

Ab Farq Nahi Padta Poetry by Jai Ojha Part – 2

Ek Waqt Tha Jab Tujhse Pyar Karta Tha,
Ab Tu Khud Mohabbat Ban Chali Aaye, Mujhe farq Nahin  Padta.

एक वक़्त था जब तुझसे बेइंतहा प्यार करता था.
अब तू खुद मोहब्बत बन चली आये, तो मुझे फर्क नहीं पड़ता.
एक वक़्त था जब मैं तेरी परवाह करता था,
अब तो तू मेरी खातिर फ़ना भी हो जाये, तो मुझे फर्क नहीं पड़ता.
एक वक़्त था जब तुझसे बेइंतहा प्यार करता था.

एक वक़्त था जब ना जाने तेरी ID के कितने चक्कर लगाता था.
तेरी हर पोस्ट तेरे हर स्टेटस के मायने निकाला करता था.
लेकिन अब सुन ले, अब सुन ले तू,
जब से मुसलसल खेला है Block और Unblock का खेल मेरे साथ,
जा मुझे ता जिंदगी तेरी block list में रखले, मुझे फर्क नहीं पड़ता.
एक वक़्त था जब तुझसे बेइंतहा प्यार करता था.
जा मुझे ता जिंदगी तेरी Block list में रखले, मुझे फर्क नहीं पड़ता.
याद कर वो वक़्त जब तेरी DP देखकर ही,
मेरी धड़कने तेज हो जाया करती थी.
याद कर वो वक़्त जब तेरी Dp देखकर ही,
मेरी धड़कने तेज हो जाया करती थी.
लेकिन अब सुन ले, अब सुन ले तू,
अब किसी राह पर बिलकुल करीब से गुजर जाये, तो मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता.
एक वक़्त था जब तुझसे बेइंतहा प्यार करता था.

एक वक़्त था जब तुझे तकलीफ में देखकर मेरी आँखे भर आया करती थी.
तुझे जो खंरोच भी जाये तो मेरी सांसे अटक जाया करती थी.
लेकिन अब सुन ले कि अब तो बेफिक्री का सुरूर है मुझपर कुछ ऐसा,
कि कम्बख्त तेरी सांसे भी थम जाये तो मुझे फर्क नहीं पड़ता.
हाँ तेरा कहना भी वाजिब है कि इसे इश्क़ नहीं कहते
पर मेरी ये कविता सुनकर जो एक बेवफा को मेरी मोहब्बत पर शक हो जाये.
तो मुझे फर्क नहीं पड़ता.
एक वक़्त था जब तुझसे बेइंतहा प्यार करता था.

एक वक़्त था जब तेरे इश्क़ कि मिशालें दिया करता था.
प्यार मोहब्बत के मायनो में बस कसमें वादे लिखा करता था.
अरे क्या कमाल हश्र किया है तूने वफ़ादाराने उल्फत का,
कि अब ये सारे का सारा शहर बेवफा हो जाये, मुझे फर्क नहीं पड़ता.
हाँ माना तेरी खूबसूरती मशहूर है दुनिया जहाँ में,
अगर इस कविता में तेरी बेवफाई के चर्चे हो जाये तो मुझे फर्क नहीं पड़ता.
एक वक़्त था जब तुझसे बेइंतहा प्यार करता था.

एक वक़्त था जब तेरी एक झलक पाने के लिए तरस जाया करता था.
तू जिस कोने से नजर आती थी, मैं बस वही ठहर जाया करता था.
अरे बिठा रखा था जो मुद्दतो से इन पलकों पे मैंने,
उसूलो से तो गिर गयी है, अब नजरो से गिर जाये तो फर्क नहीं पड़ता.
बदसीरत हो गए हो तो फिजूल है ये खूबसूरती तुम्हारी,
फिर भले खुदा तुम्हे हसीं चेहरे बक्श जाये तो फर्क नहीं पड़ता.
एक वक़्त था जब तुझसे बेइंतहा प्यार करता था.

एक वक़्त था जब तुझे शामोंशहर बैठकर मनाया करता था.
गुस्ताखियाँ तेरी हुआ करती थी और दरख्वास्तें मैं किया करता था.
तेरे उस बेवजह रूठने को मनाया है जाने कितनी दफा मैंने,
कि भले ही पूरी की पूरी कायनात ख़फ़ा हो जाये तो फर्क नहीं पड़ता.
अरे जो मेरी ना हो सकी वो उसकी क्या होगी,
अब भले कुछ वक़्त के लिए किसी गैर का दिल बहल जाये तो फर्क नहीं पड़ता.
एक वक़्त था जब तुझसे बेइंतहा प्यार करता था.

एक वक़्त था जब तेरी महक पाने को,
तू जहां से गुजरती थी, मैं वहां से गुजरता था.
जो हवा तुझे छूती है, वो मुझे छु जाये इस भरोसे चलता था.
लेकिन अब सुन ले कि अब तो सूफी हूँ खुशबु है खुद की सांसो में,
अब तो भले तू इस हवा में भी घुल जाये तो मुझे फर्क नहीं पड़ता.
कि जब से मिट्टी होना पसंद आया है मुझको,
फिर भले महलो में आशियाँ हो जाये तो फर्क नहीं पड़ता.
एक वक़्त था जब तुझसे बेइंतहा प्यार करता था.

खैर अब तुझसे नफरत है, मोहब्बत है, कोई गिला शिकवा नहीं है.
कुछ अनसुना है अनकहा है, बचा कोई सिलसिला नहीं है.
महज इन कविताओं में जिक्र बचा है तेरा और सुन ले,
कि इतना ताल्लुक भी मिट जाये तो फर्क नहीं पड़ता.
राबदा हो बेवफाओ से तो बेहतर है, मेरे यार सब सुन लेना,
फिर रिश्ता भले काफ़िर दिलो से हो जाये तो फर्क नहीं पड़ता.
एक वक़्त था जब तुझसे बेइंतहा प्यार करता था.

 

 

Mitti Hona Pasand Aaya by Jai Ojha

इस बार जो Portry है वो बहुत ही Simple है. Poetry नहीं गजल है और इसमें अलग अलग तरह के शेर है और सब में एक ही तरह का Massage देने की कोशिश की गयी है कि Down to Earth रहना कितना जरूरी है.  आखिरकार हम सब मिट्टी है. जो इनमें Hidden Massage है वो यही मिलेगा कि आपको लाइफ में सिंपल रहना सरल रहना कितना जरूरी है..

Yun to hawa Pani Akash Agni Sabkuch tha main,
lekin mujhe mera faqat mitti hona pasand aaya..

यूँ तो हवा पानी आकाश अग्नि सबकुछ था मैं.
यूँ तो हवा पानी आकाश अग्नि सबकुछ था मैं.
लेकिन मुझे तो मेरा फकत मिट्टी होना पसंद आया..
मेरे नाम में जो आई था उसे कभी बड़ा नहीं होने दिया मैंने,
मुझे हमेशा मेरे नाम में आई पे वो छोटी सी बिंदी का होना पसंद आया..
यूँ तो हवा पानी आकाश अग्नि सबकुछ था मैं.
लेकिन मुझे तो मेरा फकत मिट्टी होना पसंद आया..

यूँ कद तो दरख्तों के भी देखे है ऊँचे बहुत मैंने,
यूँ कद तो दरख्तों के भी देखे है ऊँचे बहुत मैंने,
लेकिन उन टहनियों का हमेशा नीचे की ओर झूकी होना पसंद आया.
और भले दुनिया देखती होगी आकश को चूमती हुयी वो इमारतें,
लेकिन मुझे तो उस नीवं का उन भारी भरकम पत्थरो के बीच दबी होना पसंद आया.
यूँ तो हवा पानी आकाश अग्नि सबकुछ था मैं.
लेकिन मुझे तो मेरा फकत मिट्टी होना पसंद आया..

कि कारे दौड़ाते देखा है मैंने बच्चों को घर आँगन में,
कारे दौड़ाते देखा है मैंने बच्चों को घर आँगन में,
लेकिन बचपन को तो असल में कागज से बनी वो कश्ती होना पसंद आया..
और Crush तो ज़माने को हुआ है Candy से बहुत,
लेकिन मुझे तो Nokia 1100 में वो सांप की पूँछ का लम्बी होना पसंद आया..
यूँ तो हवा पानी आकाश अग्नि सबकुछ था मैं.
लेकिन मुझे तो मेरा फकत मिट्टी होना पसंद आया..

दौड़ रहे थे सब लोग इस तरह कि होड़ मची थी जैसे first आने की,
दौड़ रहे थे सब लोग इस तरह कि होड़ मची थी जैसे first आने की,
भागते देखकर यूँ सबको, मुझे खुद का आखिरी होना पसंद आया..
और जहां आसान रास्ते ढूंढ रहे थे बाजार में सब दौलत, शौहरत, कामयाबी के,
वहीं मुझे अपनी उंगलियों का लिख लिख के यूँ खुरदरी होना पसंद आया..
यूँ तो हवा पानी आकाश अग्नि सबकुछ था मैं.
लेकिन मुझे तो मेरा फकत मिट्टी होना पसंद आया..

यूँ हजार किस्म की तमाम चोटे मिली थी जिंदगी के इस सफर में,
यूँ हजार किस्म की तमाम चोटे मिली थी जिंदगी के इस सफर में,
लेकिन इस दिल को तो बस उन्ही की बेवफाई के हाथो जख्मी होना पसंद आया..
और यूँ भले Millions थे viewers और हजारो थे Inbox में,
लेकिन मुझे मेरी ID का किसी की ब्लॉक लिस्ट में छुपी होना पसंद आया..
यूँ तो हवा पानी आकाश अग्नि सबकुछ था मैं.
लेकिन मुझे तो मेरा फकत मिट्टी होना पसंद आया..

जुल्म किये, सितम ढाहये हमपे क्या बताऊँ उन्होंने क्या क्या किया,
जुल्म किये, सितम ढाहये हमपे क्या बताऊँ उन्होंने क्या क्या किया,
और हमे बदले में बस वो फ़र्क़ नहीं पड़ता शायरी होना पसंद आया..
और तुम भले सुबह की चाय पीती हो किसी और के साथ अक्सर,
लेकिन मेरी जुबान को तो बस हमारी कैफेचिनो का यूँ बातों-2 में ठंडी होना पसंद आया..
यूँ तो हवा पानी आकाश अग्नि सबकुछ था मैं.
लेकिन मुझे तो मेरा फकत मिट्टी होना पसंद आया..

कोई बात नहीं कि मुड़कर तो दोबारा देखा भी नहीं था तुमने जाते हुए मुझे,
कोई बात नहीं कि मुड़कर तो दोबारा देखा भी नहीं था तुमने जाते हुए मुझे,
लेकिन वहां उस वक़्त उस मंजर को तो मेरा वहीं के वहीं होना पसंद आया..
और शायद भीतर लिए घूमता हूँ तुम्हें आज भी हर गली हर डगर पर,
मुझे इस फरेबी दुनिया में अपनी मोहब्बत का असली होना पसंद आया..
यूँ तो हवा पानी आकाश अग्नि सबकुछ था मैं.
लेकिन मुझे तो मेरा फकत मिट्टी होना पसंद आया..

 
यूँ इल्जाम लगे थे ढेरों लेकिन कभी आँच भी ना आयी मुझपर,
यूँ इल्जाम लगे थे ढेरों लेकिन कभी आँच भी ना आयी मुझपर,
कुछ इस तरह से मुझे मेरा खुदा की अदालत से बरी होना पसंद आया..
और खुदा मान बैठे थे ज़माने में जहाँ लोग खुद को,
वहीं जय को तो बस उसका फ़क़ीर सूफी होना पसंद आया..
यूँ तो हवा पानी आकाश अग्नि सबकुछ था मैं.
लेकिन मुझे तो मेरा फकत मिट्टी होना पसंद आया..

For you are Dust
And to Dust you shall Return

 
 

Ye Kuch Batein Hai Jo Bekar Hai by Jai Ojha

Aaj Mera Dil Jakhmi Hai, Lekin Sanson Mei Magruri Hai,

Ye kuch Baatein Hai Jo Bekar Hai Lekin Tujhe Batani Jaruri Hai.

आज मेरा दिल जख्मी हैलेकिन साँसों मे मगरूरी है,
बात उस दिन की हो रही है जिस दिन वो आशिक,
जो पूरी तरह Move On हो गया है Break up से , उसी बारे में बात है..
तो आज मेरा दिल जख्मी हैलेकिन साँसों मे मगरूरी है,
आज मेरा दिल जख्मी हैलेकिन साँसों मे मगरूरी है,
ये कुछ बातें हैं जो बेकार हैलेकिन तुझे बतानी जरूरी है..

आज तूने नहीं पूछा हाल मेरा,
आज तूने नहीं पूछा हाल मेरालेकिन तबियत मेरी अच्छी है..
मुस्कान जरा सी झूठी हैलेकिन ये बाते बिल्कुल सच्ची है..
आज तूने नहीं पूछाफिर भी मैनें खाना खाया है..
आज तूने नहीं पूछा फिर भी मैनें खाना खाया है..
आज सुबह तेरा Call नहीं थामेरी मां ने मुझे जगाया है..
आज सुबह तेरा Call नहीं था , मेरी मां ने मुझे जगाया है..
शुक्रिया तेरा कि आज राजा बेटा हुआ हूं फिर से,
इन Babu, Janu , Sona से दूरी है..
ये कुछ बातें हैं जो बेकार हैलेकिन तुझे बतानी जरूरी है..

आज बड़े दिनो बाद Whatsapp पे DP खुद की लगाई है..
क्या बताऊँ तेरी सारी Photos Delete करकेक्या गज़ब की नींद आई है..
आज तेरे होने या  होने का कोई असर नहीं होता है,
आज जा तू चौबीस घन्टें ऑनलाइन रह लेमुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है..
अरे बहुत गुजारिश कर ली तुझसे,
अरे बहुत गुजारिश कर ली तुझसेअब सख्ती अपनी भी पूरी है..
ये कुछ बाते हैं जो बेकार हैलेकिन तुझे बतानी जरूरी है..

कि आज तुझसे नहीं मिला मैंमगर मुलाकात खुद से हो गई है..
कि आज तुझसे नहीं मिला मैं मगर मुलाकात खुद से हो गई है..
तेरे बिना जी नहीं सकताये गलतफहमी दूर हो गई हैं..
तेरे बिना जी नहीं सकताये गलतफहमी दूर हो गई हैं..
आज उन पुराने Conversations को मैंने फिर से नहीं टटोला है..
आज उन पुराने Conversations को , मैंने फिर से नहीं टटोला है..
अब तू ही पढ़ उनकोकि फक्र होगा तुझे कि तूने कितनी खूबसूरती से झूठ बोला है..
अरे आज तन्हा हूं तो क्या हुआइस तन्हाई से यारी है..
ये कुछ बातें हैं जो बेकार हैलेकिन तुझे बतानी जरूरी है..

हां Phone से ले के ज़हन तक हर जगह से तुझे निकाला है..
हां Phone से लेके ज़हन तक हर जगह से तुझे निकाला है..
रिहा सा हो गया हूं जब से तेरा Number Delete कर डाला है,
मैं डरता था जिस कल सेउसे आंखों में आंखे डाल देख आया हूं..
मैं डरता था जिस कल सेउसे आंखों में आंखे डाल देख आया हूं..
तेरे लिए उन खतों को उन फूलो को खुशबू समेत फेंक आया हूं..
आज तो जैसे जीत गया हूं,
वरना बता कि सच्चे आशिक नेकभी बाजी हारी है..
ये कुछ बातें हैं जो बेकार हैलेकिन तुझे बतानी जरूरी है..

आज तेरे घर के आगे से नहीं निकलालेकिन बहुत दूर तक जा पहुंचा हूं..
फिरता था कभी गलीगलीअब आसमान में उड़ता हूं..
फिरता था कभी गलीगली अब आसमान में उड़ता हूं..
मायूसी थी छायी जहां पर आज वहां मुस्कान फिर से वहां पर लौट कर आयी है.
मायूसी थी छायी जहां पर आज वहां मुस्कान फिर से वहां पर लौट कर आयी है.
देख पलके भी कितनी खुश हैंमुद्दतों बाद गालों से जो टकराई हैं,
देख आज मैं अकेला हूं और पूरा हूंतू किसी के साथ होकर भी अधूरी हैं..
ये कुछ बातें हैं जो बेकार हैलेकिन तुझे बतानी जरूरी है..

आज उठा हूं बिस्तर से औरआईने में शक् खुद की देख डाली है..
बाल बिखरें हैं दाढ़ी बड़ी है और आंखे जरा सी काली हैं,
आज उठा हूं बिस्तर से औरआईने में शक् खुद की देख डाली है..
बाल बिखरें हैं दाढ़ी बड़ी है और आंखे जरा सी काली हैं..
आज तो जैसे आंखों का पानीखत् सा हो गया है..
टूट कर जो जुड़ा है दिलनया जन् सा हो गया है..
आज तो जैसे आंखों का पानीखत् सा हो गया है..
टूट कर जो जुड़ा है दिल नया जन् सा हो गया है..
आज सूफियत हैं रुख पे आंखों में अजब सी नूरी हैं..
ये कुछ बातें हैं जो बेकार हैलेकिन तुझे बतानी जरूरी है।

 

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