Randi Thi Saali – Wo Raat by Arti Dutt

the digital shayar
Sometimes I die from a Pain
That flows throw my vein
But I am not supposed to Shout
Because I am not a woman to be proud
On my grave & Never, Never got even Sympathy
Because they call me – “Randi Thi Saali”

रात भर सीने से लगाके इश्क़ तो जाता लेते हो..
पर जनाब जब इज्जत देने की बारी आई,
तो क्योंरंडी हैकहकर निकल जाते हो..
वो कहता था इस दुनिया की सबसे खूबसूरत हसीना हो तुम,
एक रात के लिए ही सही पर मेरी अपनी दुनिया हो तुम..
केश सँवारे, पहनी साडी, बिलकुल वैसे,
जैसे हो तुम्हारे ही घर की नारी..
फिर क्यों, फिर क्यों मेरी रात कुछ इस कदर कटती,
कि मेरे माथे की बिंदी तेरी छाती पे जा चिपकती..
मोहब्बत का इज़हार तो हर रात सिगेरट से करता..
और पैसो के नाम पर सिर्फ चार आने फेंकता..
वो रात गवाह है, उस चादर पर लगे दाग की,
तेरे जिस्म से, मेरे जिस्म की खुशबु की..
बिस्तर पर पड़े उस पैकेट की और बंद कमरों में चीख़ती आवाजों की…

कि तू ही हर रोज हर दफा मेरी गली आता है..
और मेरे रंडी होने का आरोप भरे समाज में लगाता है..
हाँ कमाती हूँ मैं पैसे, अपने कपड़े उतर अपने जिस्म बेचके,
क्योंकि भीख मांगना मुझे मंजूर नहीं..
वो क्या है ना जनाब जिस्म की तड़प से कही जयादा पेट की भूख होती है..
जिस्म जरूर मरा है लेकिन रूह आज भी जिन्दा है..
अब और क्या नंगा करूँ इस समाज को,
जो मेरे ही नंगपन पर ललचाता है..
हसी आती है इस बात पर कि ये कैसी दोहरी जिंदगी जीता है..
Don’t feel pity for me, I am happy what I am Doing.

बस इतनी सी खवाहिश है कि
अगर आओ अगली दफा मेरी गली तो जरा तहज़ीब से आना,
वरना अपना ये कोट और पेन्ट अपने घर ही उतारना..
 
 

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