Woh Gairo ke Hona Seekh Gye by Jai Ojha

the digital shayar
Hum unke the unhi ke rahe, 
Wo Na Jaane Kab gairo ke hona sikh gaye.

समय के साथ वक़्त के साथ किस तरह लोग बदल जाते है, उस पर यह शायरी है..
कि वो प्यार मोहब्बत के अकीदतमंद बड़ी जल्दी नफरत करना सीख गए..
कि वो प्यार मोहब्बत के अकीदतमंद बड़ी जल्दी नफरत करना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

हम तो नावाकिफ थे इस बात से कि वो अजनबी इस कदर हो जायेंगे..
नजर आते थे जो फ़ोन के हर गलियारें में, वो एक फोल्डर में सिमट कर रह जायेंगे..
हम तो नावाकिफ थे इस बात से कि वो इस रिश्ते को इतनी बेरहमी से तोड़ जायेंगे..
कि हमें सबसे पहले जवाब देने वाले हमारा Massage seen करके छोड़ जायेंगे..
हम शहरों शाम मुन्तजिर रहे उनके Massages जवाबों के,
और वो किसी दूसरी महफ़िल chat में Reply करना सीख गए..
जब बड़े दिनों बाद हम से पूछा हाल दिल उन्होंने,
तो भैय्या हम भी खुद्दार थे मुस्कुराके झूट बोलना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

हम नावाकिफ थे इस बात से कि लोग बदल भी जाया करते है..
वो आँखों में आँख डाल किये वादों से मुकर भी जाया करते है..
अरे सदायें (आवाज) आती थी जिनको हमारे सीने से,
वो अब किसी और से लिपटना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..
कि सदायें आती थी जिनको हमारे सीने से,
वो अब किसी और से लिपटना सीख गए..
और दिल में आशियाँ बनाया था जिन्होंने गुजरते हुए,
अब सामने से नजरे चुराके चलना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

हम नावाकिफ थे इस बात से कि वो चेहरे को साफ़ और दिल को मैला रखते है..
कुछ लोग हसी ऐसे भी होते है जो खिलौनों से नहीं जज्बातों से खेला करते है..
अरे, हम आशिक़ नादान थे ताजिंदगी भीतर बाहर एक से रहे,
और वो कम्बख्त बेवफाई करते करते रोजाना जिल्द बदलना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..
हमने उनके साथ अर्श (आकाश) के सपने देखे थे,
और जब हकीकत से हुए रूबरू तो खाई से उछलना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

हम नावाकिफ थे इस बात से कभी वक़्त हमारे इतना खिलाफ हो जायेगा..
कि उनकी मेहँदी में चुपके से बनाया वो अक्षर इस कदर साफ़ हो जायेगा..
हम उनके नाम का हर्फ़ हथेली पे नहीं दिल पे लिखना चाहते थे,
इसलिए दर्द होता रहा, हर्फ़ बनता रहा और हम दिल कुरेदना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..
दर्द होता रहा, हर्फ़ बनता रहा और हम दिल कुरेदना सीख गए..
हम उनपे मरकर जीना चाहते थे मगर,
हुए अलहदा (दूर होना) उनसे जबसे जीते जी मरना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

हम नावाकिफ थे इस बात से कि वो हमारे बिना भी रह सकते थे..
जो फ़साने उन्होंने हमसे कहे थे, अब वो किसी और से भी कह सकते थे..
अरे हमने तो सोना समझ यूँ पकडे रखा था उनको,
और वो कम्बख्त धूल थे निकले कि बड़े इत्मीनान से फिसलना सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..
अरे हमने तो सोना समझ यूँ पकडे रखा था उनको,
और वो कम्बख्त धूल थे निकले कि बड़े इत्मीनान से फिसलना सीख गए..
हम कुछ देर जो दूर हुए क्या उनसे, वो हमारे बिना रहना ही सीख गए..
हम तो उनके थे उन्ही के रहे, वो जाने कब गैरो के होना सीख गए..

 
“इसरते कतरा है दरियां में फ़ना हो जाना”
“दर्दका हद से गुजरना है दवा हो जाना”

 
 

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