Ye Shaam Bilkul Tum Jaisi Hai by Jai Ojha

the digital shayar
Din se milkar aati hai, Raat ke Aagosh me ghul Jati hai..
Ye Shaam Bilkul Tum Jaisi hai, Baat Baat me badal Jati hai..

बहुत से Writers हुए है इस दुनिया में, बहुत से शायर, बहुत से प्रेमी या बहुत से Artist, जिन्होंने अपनी अपनी गर्लफ्रेंड की तुलना, अपनी माशूका की तुलना अलग अलग चीजों से की है. जैसे किसी ने रात से तुलना की है, किसी ने चाँद से तुलना की है, किसी ने शबनम से तुलना की है, किसी ने फूल से तुलना की है, तो ऐसे Comparisons किये गए है और बहुत कुछ लिखा गया है. यहां पे जो Writer है इसकी जो गर्लफ्रेंड है वो इसकी जिंदगी में आती है और बार बार चली जाती है. बार बार आती है और बार बार चली जाती है तो इस वजह से इसके जीवन में एक बिखराव पैदा हो गया है. उस बिखराव के through ये Poetry निकलती है, तो वो लिखता है

कि दिन से मिलकर आती है, रात के आगोश में घुल जाती है..
दिन से मिलकर आती है, रात के आगोश में घुल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..

खूबसूरत है, शीतल है, आतुर भी है तुम जैसी,
खूबसूरत है, शीतल है, आतुर भी है तुम जैसी..
बस जरा नादान है शायद कि अधूरे चाँद से बहल जाती है..
ठंडी हवाएं, सुर्ख सफ़क और भी जाने कितने वादे है..
साथ रहने की कसमें खाकर, रफ़ता रफ़ता ढल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..

कि कभी सुर्ख लाल, कभी जर्द सी, कभी हवाओं सी मचल जाती है..
कभी सुर्ख लाल, कभी जर्द सी, कभी हवाओं सी मचल जाती है..
इसकी शक्ल होती अगर, तो हूहू दिखती तुम जैसी,
एक पल में मगरूर है और एक ही पल में पिघल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..

कि मन भरता है तो सब दबाकर, गम हो जाती है अँधेरे में..
मन भरता है तो सब दबाकर, गम हो जाती है अँधेरे में..
लौट आती है कुछ दूर जाकर, जब दोबारा मेरी कमी से खल जाती है..
कितना लम्बा इंतज़ार होता है कि कुछ पल मिल जाये ये शाम मुझे?
मैं आगोश में भरने लगता हूँ और ये बेरहम तन्हा छोड़ फिसल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..
बस एक गिला, एक मलाल ताउम्र रहेगा शायद इसे..
कि बस एक गिला, एक मलाल ताउम्र रहेगा शायद इसे..
कि आती है रोज मिलने और बिना मिले निकल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..

इस शाम के बाद ये रात मुझे काटनी मुश्किल हो जाती है..
कि शाम के बाद ये रात मुझे काटनी मुश्किल हो जाती है..
डूबते सूरज में सारी खुशियां जैसे, धीमी आंच पे जल जाती है..
कह दो इसे कि या तो रुक जाये, या तो ना आया करे यूँ कुछ वक़्त के लिए,
मैं बिखरा बिखरा रह जाता हूँ और ये अगले ही दिन संभल जाती है..
ये शाम बिलकुल तुम जैसी है, बात बात में बदल जाती है..

 


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